"पहला सुख निरोगी काया" स्वास्थ, संस्कार, चिकित्सा, सामाजिक, पारिवारिक, आध्यात्मिक लेखों को पढ़े तथा ज्ञान वर्धन कर जीवन को उन्नत बनायें, धन्यवाद।
सोमवार, 28 फ़रवरी 2022
शिवरात्रि पर भोलेनाथ का संदेश
शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2022
महर्षि दयानन्द जयंती
🔥।।ओ३म्।।🔥
12फरवरी भारत के लिए अनमोल दिवस,
12 फरवरी है भारत का अनमोल दिवस,
एक बालक जन्मा गुजरात के लघु शहर "टंकारा" में,
नाम था उसका मूलशंकर,
शंकर की खोज में निकला,
भटका चहुंओर पर शंकर से न मेल हुआ,
निराश होता रहा पर शंकर को खोजता रहा,
पर अन्त में प्रज्ञा चक्षु विरजानन्द से,
मथुरा में आन मिला,
खोज का यहीं राह मिला,
बनाकर विरजानन्द को गुरु,
खोज में आगे बढ़ा,
रुका न कभी
बढ़ता ही रहा,
गुरु की आज्ञा पाकर,
किया जीवन को न्योछावर,
जनता को "शंकर" दर्शन कराने के लिए,
किया उद्घोष "चलो वेद की ओर"🏃🏃🏃,
इसी में है "शंकर",
जो करता वेदों रसपान है,
खुलता उसी का "त्रिनेत्र"👁️है,
करता वही जगत् का कल्याण है, जगत् का कल्याण है,
वेदों की ज्योति जलाया अन्धकार मिटाया,
"तमसो मा ज्योतिर्गमय"
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के जंयती पर वैदिक पथ के पथिक को हार्दिक शुभकामनाएं🌷🌷🌷🚩🚩🚩
शुक्रवार, 14 जनवरी 2022
पतंग का सदेश-
बुधवार, 23 जून 2021
"सुई-धागा का संगम"
मंगलवार, 15 जून 2021
वेद क्या है
वेद क्या है
वेद परमात्मा द्वारा प्रदत्त दिव्य ज्ञान है। वेद हमारी संस्कृति के मूल आधार हैं। वेद ज्ञान-विज्ञान के अनुपम कोष हैं। विविध विद्याओं का आधार है। वेद की शिक्षाएं, संदेश, उपदेश और आदेश मानव जीवन को उन्नत बनाने वाले हैं। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना आर्य समाज के संस्थापक-
वेद मानव जीवन के संचालन की वह सूची है जिसके
अन्दर सुख-शान्ति को
प्राप्त
करने का साधन है। सूत्र है – उस सूत्र के अनुसार चलने से सुख ही सुख प्राप्त होता है। यह मानव जीवन की यात्रा को सुख और आनन्द पूर्वक
पूर्ण करने का मार्ग है। इसको समझने के लिए दो
उदाहरण लेते हैं-
1. पहला उदाहरण है “यात्रा”-
जैसे हमें कहीं जाना होता है तो हम उस स्थान पर
जाने से पहले उस स्थान की पूरी जानकारी प्राप्त करते हैं कि वह पर्वतीय (पहाड़ी) है
या पठारी (मैदानी), शहर है या गांव। उस स्थान के वातावरण आदि के
अनुकूल हम वहां पहुंचने की व्यवस्था करते हैं जिससे कि हमें किसी प्रकार का कष्ट न
हो, हर कष्ट से बचने का हर सम्भव प्रयास करतें हैं। पर
वहां पहुंचने की तैयारी उस आधार पर करते हैं, जो
हमसे पहले उस
स्थान पर जा चुका है,
भ्रमण कर चुका होता है। स्थान विशेष का भ्रमण किया हुआ व्यक्ति लौटकर उसका गुणगान, कथन हमारे सामने
किया या करता है तब हम केवल शब्द प्रमाण के
आधार पर हम उस स्थान की मानसिक कल्पना कर वहां जाने की तैयारी करते हैं तथा अपनी
योजनानुसार पूर्व तैयारी के आधार पर हम अमुक स्थान पर भ्रमण
आदि का आनन्द
लेते हैं, ले पाते हैं।
यदि योजनाबद्ध तैयारी न करें तो क्या हम आनन्द ले पायेंगे नहीं कभी नहीं।
2. दूसरा उदाहरण है वस्तु का-
मानव द्वारा निर्मित छोटी सी वस्तु के विषय में हम इतना विचार करते हैं कि किसी प्रकार का कष्ट न हो
पर क्या हमनें यह विचार किया कि हमारे जीवन में कठिनाई न हो नहीं, हमें कोई भी कुछ भी सुनाकर हमारे जीवन की पटरी को किसी भी ओर मोड़ देता है क्यों? आइये जानने का प्रयास करते हैं।
जिस प्रकार मानव अपने द्वारा बनायी हुई वस्तु का प्रयोग विधि का विवरणिका (prospectus) देता है। उसी प्रकार ईश्वर ने मानव जीवन को संचालित करने
के लिए मानव सृष्टि से पूर्व मानवोपयोगी संसाधनों का निर्माण कर उसकी प्रयोग विधि
का विवर्णिका बनाया जिसका नाम है “वेद”। वेद का अर्थ होता है ज्ञान।
ज्ञान का अर्थ होता है जानना। ज्ञान
दो प्रकार का होता है- स्वभाविक
और नैमित्तिक। स्वभाविक ज्ञान के लिए हमें प्रयत्न
करने की आवश्यकता नहीं होती है। स्वाभाविक
ज्ञान ईश्वर ने सृष्टि के सभी प्राणियों को एक समान दिया हुआ है। लेकिन एक प्राणी
को नैमित्तिक ज्ञान भी दिया जिसे अपनाकर वह जीवन-मरण
के चक्र से अथवा दु:ख
छूट से सकता है उसका नाम है मानव। मनन करने से ही मानव या मनुष्य है अन्यथा वो भी
अन्य प्राणियों की तरह एक प्राणी। ईश्वर
द्वारा दिये हुये ज्ञान को जबतक मानव समझेगा नहीं,
अपनायेगा नहीं तबतक दु:खों
के जाल से नहीं निकल सकता। ईश्वर ने मानव
को दु:ख
सागर से निकालने के लिए वेद की रचना की तथा उस ज्ञान को चार भागों में विभक्त किया जिसको
ज्ञान, कर्म, उपासना
और विज्ञान कहते हैं। जब तक ज्ञान, कर्म और उपासना का संगम नहीं होगा तबतक कल्याणकारी विचारों की उत्पत्ति नहीं हो सकती।
इन चारों वेदों का नाम है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग्वेद के अन्दर सृष्टि के
सम्पूर्ण ज्ञान का वर्णन है, यजुर्वेद में कर्म का वर्णन है कि ज्ञान को प्राप्त करके कर्म कैसे करें, सामवेद उपासना का विषय है कि हम उपासना व
प्रार्थना किसकी कब और कैसे करें, अब चौथा अथर्ववेद
वेद है। इसमें तीनों वेद अर्थात् ज्ञान, कर्म और उपासना के
आधार पर विशिष्ट ज्ञान की उत्पत्ति कैसे होगी अर्थात् विज्ञान प्राप्ति के उपायों का वर्णन है।
ईश्वर ने उत्पाद(Product) तथा उत्पाद की प्रयोग विधि आदि सब तैयार कर दिये। अब समस्या आयी की उपयोग कर्त्ता तक यह उत्पाद पहुंचे कैसे? उत्पाद को उपभोक्ता तक पहुंचाने के लिए कोई होना चाहिए। तब ईश्वर ने चारो उत्पादों (विषय) को उपभोक्ता तक पहुंचाने के लिए चार जीव का चयन अर्थात् चुनाव (select) किया तथा सम्पूर्ण ज्ञान को उनके हृदय में उतारा जिनका नाम था
अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा। ईश्वर ने इनके द्वारा समस्त मानव तक इसे पहुंचाया।
पहुंचाया कैसे? पहुंचाने का माध्यम है “श्रुति”
श्रुति अर्थात् सुनने-सुनाने की विधि। श्रुति विधि के द्वारा मानवोपयोगी ज्ञान को समस्त मानव तक पहुचाया।
जिसके
आधार पर मानव आज तक अपना जीवन यापन कर
रहा है लेकिन अभिज्ञय की भांति जिसके कारण दु:ख सागर में गोते लगा रहा है।
आज
इस ज्ञान को जानने-सुनने
में लोगों को अरुचि हो गयी
है क्योंकि लोग स्वार्थी लोगों के चंगुल में फंसकर अपनी बुद्धि को गिरवी रख कर ढोंगी, कपटी, व्यभिचारी लोगों के हाथ में अपनी मुक्ति की डोरी सौंप दिया है। थोड़ा विचार करिये
कि जो अपने जीवन की नैया कीचड़ में फंसा रखा है वह आपकी नैया कैसे पार लगा सकता है।
सुख के लिए अन्यत्र भटकते हैं, भटक रहे हैं।
जिसके कारण मानव घोर कष्ट को भोग रहा है।
भारत
के जितने भी ऋषि, महर्षि,
महापुरुष
हुये हैं उन सभी ने वेदों को धारण किया तथा अपने अनुभवों को जन समुदाय में बांटा
और उस पथ पर चलने के लिए प्रेरित किया। लेकिन दुर्भाग्य है कि हम
उनके कथनों की अवहेलना कर दु:ख
सागर में डुबे हुये हैं। यदि हम दु:ख
से छूटना चाहते हैं तो वेद के माध्यम से सुख-दु:ख
क्या है उसके विषय में जाने और उससे छूटने का प्रयत्न करें,
करना पड़ेगा दूसरा कोई मार्ग नहीं जो सुख-शान्ति दिला सके।
"करें प्रयोग रहें निरोग"
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रविवार, 11 अप्रैल 2021
हे ज्ञानवान् भगवन्
🙏प्रार्थना🙏
सोमवार, 8 मार्च 2021
महिला दिवस
शनिवार, 14 नवंबर 2020
मर और अमर में भेद
मंगलवार, 3 नवंबर 2020
करवाचौथ
बुधवार, 21 अक्टूबर 2020
गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020
सोमवार, 21 सितंबर 2020
सोमवार, 14 सितंबर 2020
"हिन्दी दिवस"
॥ओ३म्॥
॥ओ३म्॥
"हिन्दी दिवस" की हार्दिक शुभकामनाएं"
भारत के जनमानस की,
सहज, सरल अभिव्यक्ति है हिन्दी,
भारत की शक्ति है हिन्दी,
संस्कृति व परम्परा का,
संवाहक है हिन्दी,
सभ्यता व समृद्धि का,
आधार है हिन्दी,
भारत का स्वाभिमान है हिन्दी,
हिन्दी बिना नरक है जीवन।

"हिन्दी की करुण व्यथा"
हिन्दी दिवस मनाने की परंपरा,
1953 में
प्रारंभ हुई,
हिन्दी जन-जन की थी रानी,
रह गयी अब एक दिन की,
इसकी कहानी,
उर्दू और अंग्रेजी को,
होना चाहिए था नौकरानी
पर वह बनी महारानी,
कहते हम हैं हिन्दूस्तानी,
एक दिन जो हिन्दी के लिए चुना,
वो दिन भी मुझसे छीन लिया,
उस दिन भी,
हिन्दी दिवस के नाम पर,
हिन्दी को उर्दू और अंग्रेजी में,
देते हैं उसको बधाई,
देखो कैसा दिवस है भाई।
यह कैसी आजादी की,
झलक दिखाई,
365 में 364 दिन छिन कर,
एक दिन मुझे दिया,
वो भी मुझसे छीन लिया,
कहते हो हमने आज,
हिन्दी दिवस मनाया,
हिन्दी दिवस की,
हार्दिक शुभकामनाएं।
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
समाज सुधारक, दलितों उद्धारक, नारी शिक्षा के प्रथम समर्थक, नारी शिक्षालय(विद्यालय) के आरम्भ करने वाले अमर हुतात्मा महर्षि दयानन्द जी ने उत्तम सन्तान निर्माण के लिए "देवनागरी लिपि" में अक्षर ज्ञानादि से शिक्षित करने का निर्देश अपने अमर ग्रंथ "सत्यार्थ प्रकाश' के द्वितीय समुल्लास शिक्षा प्रकरण में विस्तार से लिखा है।


संवैधानिक मान्यता-
लेकिन लोग हिन्दी दिवस को भी Happy hindi divas कहकर मनाते हैं। और सरकारी हो या निजी समस्त कार्य अंग्रेजी में किया जाता है, किया जा रहा है। यह हिन्दी का अपमान है या सम्मान। हिन्दी भाषी व क्षेत्रीय भाषी को अपने किसी भी कार्य विवरणिका (कागजात, या जानकारी) को पढ़ने व समझने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। आज भी भारत गुलामी के नियमों पर ही चल रहा है। उसी के चंगुल में फंसा हुआ है। क्या इसे आजादी कहें, कहते है।
पुरस्कार-
हिन्दी दिवस पर पुरस्कार वितरण कार्य का आरम्भ 1986 में किया गया। इस अवसर पर दो पुरस्कार दिये जाते थे जिसका नाम था "इन्दिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार" और "राजीव गांधी राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान मौलिक लेखन पुरस्कार"- इसके अन्तर्गत विज्ञान आधारित विषयों पर हिंदी में किसी व्यक्ति की ओर से लिखी गई पुस्तकों को 10,000 रुपये से दो लाख रुपये तक के पुरस्कार दिए जाते थे|
परिवर्तन-
गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह निर्णय मंत्रालयों और जनता के बीच मौजूदा पुरस्कार योजनाओं को लेकर भ्रम को समाप्त करने के लिए लिया गया है। अभी तक इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार के अनुसार हिंदी का सबसे प्रगतिशील उपयोग करने वाले मंत्रालयों या सरकारी कंपनियों या बैंकों को पुरस्कार के तौर पर शील्ड दी जाती थी। जबकि हिंदी में सर्वश्रेष्ठ मौलिक पुस्तकें लिखने वाले केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 40,000 रुपये से एक लाख रुपये तक के नकद पुरस्कार मिलते थे।
"राजीव गांधी राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार" योजना में विज्ञान आधारित विषयों पर हिंदी में किसी व्यक्ति की ओर से लिखी गई पुस्तकों को 10,000 रुपये से दो लाख रुपये तक के पुरस्कार दिए जाते थे।
नए आदेश के अनुसार "राजभाषा कीर्ति पुरस्कार" योजना के अन्तर्गत मंत्रालयों, पीएसयू, ऑटोनोमस बोर्ड्स और सरकारी बैंकों को 39 शील्ड्स दी जाएंगी नई राजभाषा गौरव पुरस्कार योजना के तहत ज्ञान और विज्ञान विषयों पर क्वॉलिटी वाली पुस्तकें लिखने वाले नागरिकों को 10,000 रुपये से दो लाख रुपये के 13 पुरस्कार दिए जायेंगे।लेकिन हिंदी में मौलिक पुस्तकें लिखने वाले केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 30,000रुपये से एक लाख रुपये के चार नकद पुरस्कार दिए जाएंगे।
"करें प्रयोग रहें निरोग"
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