बुधवार, 29 अप्रैल 2020

ग्रीष्म ऋतुचर्या (Summer season)


‌‌                             ॥ओ३म्॥

ग्रीष्म ऋतुचर्या (Summer season)

ग्रीष्म ऋतु का परिचय-

सर्दी और गर्मी को मिलाने वाली तथा गर्मी का प्रारंभ करने वाली वसंत ऋतु समाप्त हो जाने पर जिन महीने में गर्मी अपने पूरे रूप में पड़ने लगती है उस ऋतु का नाम ग्रीष्म ऋतु है। इन दिनों सूर्य अपने अपनी पूरी शक्ति से संसार को तपाता है। सूर्य का ताप प्रकाश और प्राण ग्रीष्म ऋतु में अधिक से अधिक प्राप्त होता है। इसलिए सूर्य से मिलने वाले इन वस्तुओं का हमें इस ऋतु में अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए। सूर्य रश्मियों के सहारे से अपने मलों और विकारों को निकालकर निर्मलता और पवित्रता प्राप्त करनी चाहिए। यह काल आदान काल कहलाता है। साधारणतः समझा जाता है कि इस समय हमारा बल-शक्ति आदि क्षीण हो जाते हैं। परंतु यदि हम इस ऋतु का ठीक उपयोग करें तो इस द्वारा हमारा कोई भी वास्तविक बल क्षीण न होगाकिंतु आदित्यदेव की पवित्रता कारक किरणों के उपयोग से केवल मलदोष और विकार ही क्षीण होते हैं। सूर्य भगवान् हमारे शरीर में से केवल मलों और दोषों का आदान करके हमें पवित्र करते हैं।





शनिवार, 11 अप्रैल 2020

महामारी फैलने का मुख्य कारण {Reasons for EPIDEMIC outbreak}

                 ॥ओ३म्॥

महामारी फैलने का मुख्य कारण

  {Reasons for EPIDEMIC outbreak}




[ले०दीपिका, बी.ए.एम.एस. द्वितीय वर्ष, पतञ्जलि आयुर्वेद महाविद्यालय, हरद्वार, (उत्तराखण्ड) 9991337335]
 [आज न केवल मानव अपितु सम्पूर्ण प्राणि-जगत् विश्व स्तर पर त्रिविध तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) से त्रस्त होकर त्राहि-त्राहि कर रहा है। सभी प्राणियों में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है (न मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किञ्चित्। महाभारत, शान्तिपर्व ३२९.८)]। लेकिन यह तब है जबकि वह स्वयं मर्यादित रहकर धर्मयुक्त आचरण करे। धर्म से हीन होने पर इससे निकृष्ट भी कोई नहीं है—‘धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः। मनुष्येतर प्राणी प्रकृति-प्रदत्त मर्यादाओं में रहते हुए स्वजीवन को सञ्चालित करते हैं। इसीलिए वे स्वाभाविक रूप से किसी के लिए संकट नहीं बनते। लेकिन जब मनुष्य धर्मभ्रष्ट होता है तो यह न केवल प्राणिजगत् के लिए अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लिए विनाशक बन जाता है। जब-जब यह मर्यादाहीन, धर्महीन हुआ है तब-तब किसी न किसी महामारी के माध्यम से यह सभी के लिए संकट बना है। हमें ऋषियों के निर्देश सर्वथा ध्यान में रखने चाहियें किअपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूज्यानां तु विमानना। त्रीणि तत्र प्रवर्त्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम्॥ अर्थात् जिस देश व समाज में अपूज्य(दुष्ट) व्यक्तियों की पूजा होती है और पूज्य (परोपकारी) व्यक्तियों का तिरस्कार होता है वहां दुर्भिक्ष (अकाल), असामयिक मृत्यु तथा भय ये तीनों विपत्तियां सदा बनी रहती हैं।

 इसी प्रकार के अनेक कारणों का विवेचन एवं विश्लेषण आयुर्वेद की अध्येत्री दीपिका ने चरक संहिता, विमानस्थान के तृतीय-अध्याय के माध्यम से प्रकृत लेख में किया है।सम्पादक- वैद्य. सुनीता अग्रवाल]  


जब-जब मनुष्य प्रकृति के विपरीत जाता है तब-तब उसे भयंकर क्षति का सामना करना पड़ता है। जैसा कि आजकल दिखाई भी दे रहा है Corona virus के रूप में। जो कहा जा रहा है कि चमगादड़ व सांपों में होने वाली बीमारी है पर आज मनुष्यों में भी देखी जा रही है। यह इसी का तो परिणाम है कि मनुष्य का जो धर्म है वह उसके विपरीत जा रहा है और प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रहा है। तो प्रकृति तो अपना सन्तुलन सुधारेगी ही वह चाहे जिस भी रूप में हो, चाहे कोई प्राकृतिक आपदा भूकम्प आदि या कोई महामारी। यह कोई पहली बार नहीं है जो प्रकृति एक महामारी के रूप में अपना सन्तुलन बना रही है। हमारे संज्ञान में इससे पहले भी तीन बार प्रकृति यह दोहरा चुकी है—1720 में The Creat plague of Marveille के रूप में, 1820 में The cholera pandamic in Asia के रूप में तथा 1920 में Spanish flu के रूप में और अब 2020  में Corona virus outbreak के रूप में इससे यह  सिद्ध होता है कि प्रकृति अपना सन्तुलन बना ही लेगी चाहे हम उसके साथ कितनी ही छेड़खानी क्यों न कर लें। इसलिए हमें प्रकृति के सन्तुलन के अनुसार ही चलना चाहिए।

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

"कार्य की सफलता" (Success of work)

                                                                   🔥।।ओ३म्।।🔥

            "कार्य की सफलता" (Success of work)

कार्यकुशलता व सुव्यवस्था पर निर्भर है। इन दोनों का आधार धैर्य है जो सफलता की प्रथम सीढ़ी है। ऐसे ही त्रेतायुग के सुप्रसिद्ध देश व धर्म रक्षक ओज-तेज से पूर्ण शारीरिक, मानसिक व चारित्रिक बल के धनी, कार्य कुशल धीर, वीर, गम्भीर, वेद-वेदांगों के ज्ञाता प्रभु श्रीराम के कार्य को सफल बनाने वाले भक्त बाल ब्रह्मचारी महाबीर हनुमान जी जयन्ती पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।


सोमवार, 30 मार्च 2020

झूले की वैज्ञानिकता

                   
 झूले की वैज्ञानिकता

स्वास्थ्यवर्धक व मनोरंजक झूला- 

झूला झूलना शारीरिक मानसिक रोग को दूर करने में बहुत ही उपयोगी है तथा मनोरंजन का अच्छा साधन। सावन और बसन्त के झूले बहुत ही मनोहारी होते हैं।

सावन का महीना पवन करे सोर,जियरा रे झूमे ऐसे जैसे मनवा नाचे मोर।नाचें गाएं धूम मचायें बच्चे बुढ़े और जवान,रोग मिटाएं, तन-मन में उमंग जगायें, दवा पास न लायें।

झूले का महत्व-

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

“वेदवाणी मासिक पत्रिका”


“वेदवाणी मासिक पत्रिका”

‘वेदवाणी’ अर्थात् वेद का वचन, कथन। वेद = ज्ञान। वाणी = वचन। वेद अर्थात् ज्ञान की चार पुस्तक  (ग्रन्थ) है जिसे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद अथर्ववेद कहा जाता है। वेद मानव जीवन का सूचीपत्र (Catalogs) है। इसमें मानव के उत्थान-पतन का समस्त ज्ञान-विज्ञान है। वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। इसका पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना मानव का परम धर्म है। परम = उत्कृष्ट, मुख्य, प्रधान, पूर्णरूप से। धर्म = धारण करने योग्य, अपनाने योग्य।



शनिवार, 21 मार्च 2020

अवसर अभी है

🔥।।ओ३म्।।🔥
"अवसर अभी है"
ज्ञान का सागर चार वेद,
यह वाणी है भगवान् की,

इसी से मिलती सब सामग्री,
जीवन के कल्याण की,
इसके विपरीत जो जायेंगा,
जीवन में कभी न सुख पायेंगा,
दिन-हीन व दु:ख सागर से,
कभी न निकल पायेगा,
जंगल को काट प्रकृति को,
उजाड़ा हमने,
जीवों को खाकर पेट को,
बनाया कब्रिस्तान है,
संतुलन बिगाड़ प्रकति का,
हमने स्वयं को संकट में है डाला ,
अभी तो "कोरोना" आया है,
आगे आगे देखो,
क्या-क्या आयेगा,
अभी भी संज्ञान न लिया तो,
तिल-तिल मरने को,
विवश हो जाओगे,
ईश्वर को चुनौती देने वाले,
ज्यादा नहीं थोड़ी समझ दिखाओं तुम,
जीवों की हत्या  बन्द करो,
प्रकृति संगीतमय बनायें हम,
जीवन का आनन्द लौटायें हम,
अपनों का साथ निभायें हम,
गौ पालन का अभियान चलाओ तुम,
जिसमें है तेंतीस कोटी,
देवताओं का निवास,
सुख-शान्ति का जिसमें वास,
रसायन मिश्रित मिल रहे हैं आहार सभी,
क्योंकि प्रकृति से प्यार नहीं,
हमें ब्रांडेड व विदेशी वस्तु से है प्यार,
स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ,
महर्षि दयानन्द ने किया आह्वान है,
"चलो वेदों की ओर"
जय भारत 

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

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